Shri Durga Saptashati Full Lyrics with Hindi & English Meaning
Explore the full lyrics of Shri Durga Saptashati Full with Hindi and English meaning. Listen to the audio and understand every line for easy devotion and daily chanting.
हिन्दी सारांश
श्री दुर्गा सप्तशती आदिशक्ति की महिमा का ७०० श्लोकों वाला महापर्व है। यह हमें सिखाती है कि हमारे भीतर के दैत्य (क्रोध, लोभ, अहंकार) केवल ईश्वरीय चेतना और शक्ति से ही परास्त हो सकते हैं। यह जीवन के संघर्षों में धर्म की विजय और आत्म-साक्षात्कार का एक दिव्य मार्ग है।
English Summary
Shri Durga Saptashati is a 700-verse epic celebrating the triumph of the Divine Mother over dark forces. It redefines existence as a cosmic battle between the ego and the higher self. It empowers the seeker to invoke their latent spiritual energy and navigate worldly challenges with absolute grace and divine protection.
Detailed Spiritual Essence
In हिन्दी & English
Detailed Spiritual Essence
OneSanatan.com पर आपका स्वागत है, जहाँ हम श्री दुर्गासप्तशती (जिसे चण्डीपाठ के नाम से भी जाना जाता है) के अगाध आध्यात्मिक स्वरूप पर प्रकाश डाल रहे हैं। पारंपरिक रूप से महान ऋषि महर्षि मार्कण्डेय द्वारा रचित यह पावन ग्रंथ पवित्र मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत अस्सी से तिरानवे अध्यायों में समाहित है। शाक्त परंपरा और सनातन संस्कृति का यह एक प्रमुख ग्रंथ है, जो परम चेतना, ब्रह्मांडीय व्यवस्था और मानवीय मुक्ति के रहस्यों को उद्घाटित करता है। पीढ़ियों से साधक इस ग्रंथ के माध्यम से उस आदि शक्ति का आह्वान करते आए हैं जो संपूर्ण ब्रह्मांड का संचालन और पालन करती है, तथा भौतिक जगत और आध्यात्मिक परमतत्व के मध्य सेतु का कार्य करती है।
साहित्यिक दृष्टि से यह ग्रंथ संस्कृत भाषा में रचित है, जिसमें मुख्य रूप से प्रवाहमयी और भावात्मक अनुष्टुप छंद का प्रयोग हुआ है, साथ ही कुछ गद्यात्मक और अन्य काव्यात्मक विधाएं भी शामिल हैं। सप्तश्लोकी दुर्गा के अंतर्गत दिए गए शुरुआती श्लोक भगवान शिव और माता देवी के बीच उस पावन संवाद को प्रस्तुत करते हैं जो कलि युग में साधना की सुगमता और सिद्धि के उपायों पर प्रकाश डालता है। इन श्लोकों की शब्द रचना, स्वर विज्ञान और लयबद्धता केवल साहित्यिक सौंदर्य के लिए नहीं, बल्कि साधक के भीतर सुप्त आध्यात्मिक ऊर्जा को जाग्रत करने के लिए डिज़ाइन की गई है। प्रत्येक अक्षर एक पवित्र ध्वनि तरंग के रूप में कार्य करता है जो मन और श्वास को ब्रह्मांडीय लय के साथ जोड़ता है।
पारंपरिक साधना पद्धति में श्री दुर्गासप्तशती का पाठ वासंतिक और शारदीय नवरात्रि के पवित्र पर्वों के साथ-साथ मंगलवार और शुक्रवार जैसे विशेष दिनों में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। भक्तजन दैनिक पाठ अथवा अनुष्ठानिक पूर्ण पाठ (पाठ) का अभ्यास करते हैं, जिसमें शुद्धि, संकल्प और पारंपरिक पद्धति के अनुसार पूजन अर्चन शामिल होता है। यह साधना संपूर्ण पूजा अनुक्रम का अभिन्न अंग है, जिसमें देवी को लाल पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं, जो साधक द्वारा अपनी अहंकार वृत्ति को देवी के चरणों में समर्पित करने का प्रतीक हैं।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह ग्रंथ आंतरिक बाधाओं, भय, अज्ञान और मानसिक दरिद्रता को दूर करने का एक मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक मार्गदर्शक है। आचार्यों और टीकाकारों का मत है कि इस ग्रंथ में वर्णित देवी ही महामाया हैं जो जीवों को मोह में बांधती हैं, और वही सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर मोक्ष प्रदान करने वाली विद्या भी बनती हैं। 'सर्वमंगलमंगल्ये' तथा 'दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः' जैसे श्लोक इस बात का आश्वासन देते हैं कि माता का स्मरण मात्र से समस्त भय नष्ट होते हैं और जीवन में परम कल्याण, शांति तथा आध्यात्मिक स्पष्टता का उदय होता है।
इस पावन ग्रंथ के संपादन और पाठ की शुद्धता के लिए गीता प्रेस, गोरखपुर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के प्रमाणित संस्करणों का संदर्भ लिया जाता है, जो प्रामाणिक हिंदी अर्थ और अनुष्ठानिक निर्देशों के साथ मूल पाठ को सुरक्षित रखते हैं। ये विश्वसनीय स्रोत सुनिश्चित करते हैं कि सप्तश्लोकी दुर्गा के संवादों सहित सभी संस्कृत श्लोक अपनी मूल शुद्धि, छंद और पारंपरिक पवित्रता के साथ पाठकों तक पहुंचें।
संक्षेप में, यह ग्रंथ केवल एक प्राचीन ऐतिहासिक रचना नहीं बल्कि आध्यात्मिक रूपांतरण की एक जीवंत मार्गदर्शिका है। देवी के कल्याणकारी स्वरूप—अज्ञान का नाश करने वाली उनकी शक्ति, असीम करुणा और कृपा—का स्मरण करते हुए साधक अपनी सभी सीमाओं का अतिक्रमण करता है। OneSanatan.com पर प्रस्तुत इस पावन पाठ के माध्यम से साधक अपने भीतर स्थित आदिशक्ति का आह्वान करता है, जिससे जीवन में शांति, शक्ति और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
Welcome to OneSanatan.com as we explore the profound spiritual essence of the Shri Durga Saptashati, universally revered also as the Chandi Path. Traditionally attributed to the sage Maharshi Markandeya, this monumental text is embedded directly within the sacred narrative of the Markandeya Purana, specifically encompassing chapters eighty-one through ninety-three. As a cornerstone of Shakta literature and esoteric Hindu cosmology, the text emerges from an ancient oral and textual lineage, preserving the dynamic interplay between supreme consciousness, cosmic order, and human liberation. Generations of practitioners have turned to these verses to invoke the primordial feminine energy that sustains the universe, bridging the eternal gap between the created realm and the transcendent divine absolute.
Literarily, the text is composed in classical Sanskrit, predominantly utilizing the fluid and emotive Anushtubh metre, alongside select passages in prose and varied lyrical structures. The opening verses provided in the Saptashloki Durga set a reverent and accessible tone, capturing an intimate dialogue between Lord Shiva and Goddess Devi regarding the spiritual efficacy required during the turbulent age of Kali Yuga. The precise arrangement of syllables, the phonetics of the invocations, and the rhythmic cadence of the verses are designed not merely for aesthetic appreciation, but to awaken dormant spiritual faculties within the practitioner. Every syllable operates as a sacred sound vibration, aligning the aspirant's breath and mind with cosmic rhythms.
In traditional practice, the recitation of the Shri Durga Saptashati occupies a central role during the sacred festivals of Navaratri, occurring biannually in the spring and autumn, as well as on holy weekdays like Tuesday and Friday. Devotees often engage in structured daily recitation or complete ritual readings known as Patha, which follow precise preparatory purification rites, ancestral invocations, and specific placement rituals often detailed in traditional manuals. The practice is integrated into comprehensive puja sequences where the Goddess is offered red flowers, incense, lamps, and sacred food offerings, symbolizing the absolute surrender of the ego to the divine mother who nourishes and protects all beings.
From a spiritual perspective, the text serves as a psychological and metaphysical guide for overcoming internal obstacles, fear, poverty of spirit, and illusion. Achievers and traditional commentators emphasize that the Devi described in these hymns is both Mahamaya, who binds souls in worldly attachment, and the liberating force who grants ultimate wisdom and grace when propitiated with sincere devotion. Verses such as 'Sarvamangalamangalye' and the heartfelt plea 'Durge smruta harasi bhitimaseshajan-tah' encapsulate the assurance that invoking the Divine Mother dismantles deep-seated fears and bestows auspiciousness, peace, and spiritual clarity upon the seeker.
Editorial verification of this sacred text relies heavily on authoritative standard editions published by institutions such as Gita Press, Gorakhpur, which meticulously preserve the traditional text along with authentic Hindi translations and ritual guidelines. These trusted print sources ensure that the Sanskrit verses, including the introductory dialogue from the Saptashloki Durga, remain untainted by modern alterations, maintaining the exact metre, punctuation, and contextual integrity required for serious ritual and meditative study.
Ultimately, this text-specific summary reminds us that the Shri Durga Saptashati is far more than a historical scripture; it is a living manual for spiritual transformation. By engaging with the divine attributes of the Goddess—her fierce protection against ignorance, her boundless compassion, and her ultimate bestowal of grace—the seeker transcends mortal limitations. Through mindful recitation and inner contemplation offered on OneSanatan.com, the practitioner invokes the eternal mother within, establishing a direct conduit to divine peace, strength, and liberation.
Shri Durga Saptashati Full - AI Voice
Sacred Script
॥ सप्तश्लोकी दुर्गा ॥
शिव उवाच-
देवि त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनी। कलौ हि कार्यसिद्धयर्थमुपायं ब्रूहि यत्नतः॥
देव्युवाच-
शृणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्टसाधनम्। मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः प्रकाश्यते॥
१. ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति॥
२. दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभं ददासि। दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता॥
३. सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
४. शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे। सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
५. सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते। भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥
६. रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्। त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्यश्रयतां प्रयान्ति॥
७. सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि। एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥
॥ देवी कवचम् ॥
मार्कण्डेय उवाच-
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्। यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥
ब्रह्मोवाच- अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतपकारकम्। देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुश्व महामुने॥
१. प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥
२. पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥
३. नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः। उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥
४. अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे। विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥
५. न तेषां जायते किञ्चित् अशुभं रणसङ्कटे। नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥
६. यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते। ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥
७. प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना। ऐन्द्री गजसमारुढा वैष्णवी गरुडासना॥
८. माहेश्वरी वृषारुढा कौमारी शिखिवाहना। लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥
९. श्वेतरुपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना। ब्राह्मी हंससमारुढा सर्वाभरणभूषणभूषिता॥
१०. इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः। नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥
११. दृश्यन्ते रथमारुढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः। शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥
१२. खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च। कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥
१३. दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च। धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥
१४. नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे। महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥
१५. त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि। प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥
१६. दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी। प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥
१७. उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी। ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥
१८. एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना। जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥
१९. अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता। शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥
२०. मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी। त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥
२१. शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी। कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी॥
२२. नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका। अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥
२३. दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका। घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥
२४. कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला। ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥
२५. नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी। स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥
२६. हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च। नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥
२७. स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी। हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥
२८. नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा। पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी॥
२९. कट्यां भगवतीं रक्षेज्जानूनी विन्ध्यवासिनी। जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥
३०. गुल्फयोर्नाारसिंही च पादपृष्ठे तु तेजसी। पादाङ्गुलीषु श्रीरक्षेत्पादधस्तालवासिनी॥
३१. नखान् रक्षतु कौबेरी रोमाणि त्वग्निदेवता। रुधिरं चक्रिणी रक्षेन्मांसं मे वज्रधारिणी॥
३२. अस्थिमज्जगतं मेदं पार्वती परिपातु नः। आन्त्रं कलाधरा रक्षेत्पित्तं च परमेश्वरी॥
३३. शुकामे ब्रह्मणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा। अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥
३४. प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्। वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥
३५. रसे रुपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी। सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥
३६. आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी। यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥
३७. गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके। पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥
३८. पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा। राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥
३९. रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु। तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥
४०. पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः। कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥
४१. तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः। यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्॥
४२. परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतल पुमान्। निर्भयो जायते मर्त्यः सङ्ग्रामेष्वपराजितः॥
४३. त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्। इदं हि देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्॥
४४. यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः। दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्ये चापराजितः॥
४५. जीवेद्वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः। नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः॥
४६. स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्। नश्यति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते॥
४७. ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः। ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः॥
४८. नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते। मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्॥
४९. यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले। जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥
५०. यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्। तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥
५१. देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्। प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥
५२. लभते परमं रुपं शिवेन सह मोदते॥ ॐ ॥
॥ अर्गला स्तोत्रम् ॥
ॐ नमश्चण्डिकायै ॥ मार्कण्डेय उवाच-
ॐ जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतापहारिणि। जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥
१. जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपाललिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥
२. मधुकैटभविध्वंसि विधातृवरदे नमः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
३. महिषासुरनिर्नाशि भक्तानां सुखदे नमः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
४. रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
५. शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
६. वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
७. अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
८. नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
९. स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
१०. चण्डिके सततं युद्धे जयन्ति पापनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
११. देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
१२. विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
१३. विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
१४. सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
१५. विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तञ्च मां कुरु। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
१६. प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
१७. चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
१८. कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
१९. हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
२०. इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
२१. देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
२२. देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
२३. भार्यां मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्। तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्याचलोद्भवे॥
२४. इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः। स तु सप्तशतीसङ्ख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्॥
॥ कीलक स्तोत्रम् ॥
ॐ नमश्चण्डिकायै ॥ मार्कण्डेय उवाच-
१. ॐ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे। श्रेयःप्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्धधारिणे॥
२. सर्वमेतद्विजानीयान्मन्त्राणामभिकीलकम्। सोऽपि क्षेममवाप्नोति सततं जाप्यतत्परः॥
३. सिद्ध्यन्त्युच्चाटनादीनि वस्तूनि सकलान्यपि। एतेन स्तुवतां देवीं स्तोत्रमात्रेण सिद्ध्यति॥
४. न मन्त्रो नौषधं तत्र न किञ्चिदपि विद्यते। विना जाप्येन सिद्ध्येत सर्वमुच्चाटनादिकम्॥
५. समग्राण्यपि सिद्ध्यन्ति लोकशङ्कामिमां हरः। कृत्वा निमन्त्रयामास सर्वमेवमिदं शुभम्॥
६. स्तोत्रं वै चण्डिकायास्तु तच्च गुप्तं चकार सः। समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावन्नियन्त्रणाम्॥
७. सोऽपि क्षेममवाप्नोति सर्वमेव न संशयः। कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहितः॥
८. ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति। इत्थं रूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम्॥
९. यो निष्कीलां विधायैनां नित्यं जपति सस्फुटम्। स सिद्धः स गणः सोऽपि गन्धर्वो जायते वने॥
१०. न चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्वापि हि जायते। नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात्॥
११. ज्ञात्वा प्रारभ्य कुर्वीत ह्यकुर्वाणो विनश्यति। ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधैः॥
१२. सौभाग्यादि च यत्किञ्चिद्दृश्यते ललनाजने। तत्सर्वं तत्प्रसादेन तेन जाप्यमिदं शुभम्॥
१३. शनैस्तु जप्यमानेऽस्मिंस्तोत्रे सम्पत्तिरुच्चकैः। भवत्येव समग्रापि ततः प्रारभ्यमेव तत्॥
१४. ऐश्वर्यं तत्प्रसादेन सौभाग्यारोग्यसम्पदः। शत्रुहानिः परो मोक्षः स्तूयते सा न किं जनैः॥
॥ नारायणी स्तुति (अध्याय ११) ॥
ऋषिरुवाच- देव्या हते तत्र महासुरेन्द्रे सेन्द्राः सुरा वह्निपुरोगमास्ताम्। कात्यायनीं तुष्टुवुरिष्टलाभाद्विकाशिवक्त्राब्जविकाशिताशाः॥
१. देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य। प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य॥
२. आधारभूता जगतस्त्वमेका महीस्वरूपेण यतः स्थितासि। अपां स्वरूपस्थितया त्वयैतदाप्यायते कृत्स्नमलङ्घ्यवीर्ये॥
३. त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमाऽसि माया। सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः॥
४. विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु। त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः॥
५. सर्वभूता यदा देवी भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी। त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः॥
६. सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते। स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
७. कलाकाष्ठादिरूपेण परिणामप्रदायिनि। विश्वस्युपरतौ शक्ते नारायणि नमोऽस्तु ते॥
८. सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
९. सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि। गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते॥
१०. शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे। सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
११. हंसयुक्तविमानस्थे ब्रह्माणीरूपधारिणि। कौशाम्भःक्षरिके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
१२. त्रिशूलचन्द्राहिधरे महावृषभवाहिनि। माहेश्वरीस्वरूपेण नारायणि नमोऽस्तु ते॥
१३. मयूरकुक्कुटवृते महाशक्तिधरेऽनघे। कौमारीरूपसंस्थाने नारायणि नमोऽस्तु ते॥
१४. शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गगृहीतपरमायुधे। प्रसीद वैष्णवीरूपे नारायणि नमोऽस्तु ते॥
१५. गृहीतोग्रमहाचक्रे दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे। वराहरूपिणि शिवे नारायणि नमोऽस्तु ते॥
१६. नृसिंहरूपेणोग्रेण हन्तुं दैत्यान् कृतोद्यमे। त्रैलोक्यत्राणसहिते नारायणि नमोऽस्तु ते॥
१७. किरीटिनि महावज्रे सहस्रनयनोज्ज्वले। वृत्रप्राणहरे चैन्द्रि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
१८. शिवदूतीस्वरूपेण हतदैत्यमहाबले। घोररूपे महारावे नारायणि नमोऽस्तु ते॥
१९. दंष्ट्राकरालवदने शिरोमालाविभूषणे। चामुण्डे मुण्डमथने नारायणि नमोऽस्तु ते॥
२०. लक्ष्मि लज्जे महाविद्ये श्रद्धे पुष्टि स्वधे ध्रुवे। महारात्रि महामाये नारायणि नमोऽस्तु ते॥
२१. मेधे सरस्वति वरे भूति बाभ्रवि तामसि। नियते त्वं प्रसीदेशे नारायणि नमोऽस्तु ते॥
२२. सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते। भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥
२३. एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम्। पातु नः सर्वभूतभ्यः कात्यायनि नमोऽस्तु ते॥
२४. ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम्। त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते॥
॥ सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम् ॥
शिव उवाच- शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्। येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत्॥
न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्। न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥
कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्। अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥
मन्त्रः: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।
इति गुह्यतमं देवैः शिवेन परिकीर्तितम्। कुञ्जिकास्तोत्रं संपूर्णम्॥
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