Sacred Sahasranama
Dual-Voice

Shri Shiva Sahasranama Lyrics (Full) with Meaning in Hindi & English for Inner Peace & Stability

Explore the full lyrics of Shri Shiva Sahasranama with Hindi and English meaning. Listen to the audio and understand every line for easy devotion and daily chanting.

Shiva Sahasranama Meditation Thousand Names Lyrics
Shri Shiva Sahasranama Lyrics (Full) + Meaning in Hindi & English | Inner Peace & Stability

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ॐ

हिन्दी सारांश

भगवान शिव के एक हजार नामों का यह पाठ अनंत चेतना का विस्तार है। शिव ही आदि और अंत हैं। यह सहस्रनाम साधक को सांसारिक मोह से मुक्त कर परम शांति और शिवत्व (कल्याण) की ओर ले जाता है। प्रत्येक नाम शिव के एक विशेष दिव्य गुण का प्रतीक है।

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English Summary

Shri Shiva Sahasranama is the litany of a thousand names of Lord Shiva, representing the infinite dimensions of pure consciousness. It is a transformative path that leads the seeker from duality to unity, dissolving the ego and anchoring the soul in the eternal silence and auspiciousness of Mahadeva.

Detailed Spiritual Essence

In हिन्दी & English

OneSanatan.com पर आपका स्वागत है, जहाँ हम भगवान महाकाल को समर्पित अत्यंत पवित्र श्रीशिवसहस्रनामस्तोत्रम् के आध्यात्मिक सार और गहन महत्व पर प्रकाश डाल रहे हैं। महाभारत के अनुशासन पर्व के अंतर्गत संरक्षित पारंपरिक आख्यानों के अनुसार, भगवान शिव के इन एक हजार नामों का यह पावन स्रोत महर्षि उपमन्यु द्वारा श्री कृष्ण को प्रदान किया गया था। प्राचीन भारत की ऐतिहासिक महाकाव्य परंपरा में गहराई से निहित यह ग्रंथ उस व्यापक पौराणिक एवं ऐतिहासिक साहित्य का हिस्सा है, जिसकी रचना सामान्य युग की शुरुआती शताब्दियों में हुई थी। सनातन धर्म की जीवंत परंपराओं में, यह स्तोत्र शैव उपासना का एक अनिवार्य स्तंभ बना हुआ है, जिसे भगवान शिव की सर्वव्यापक और अनंत ऊर्जा का आह्वान करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।

शास्त्रीय संस्कृत भाषा में रचे गए इस स्तोत्र में मुख्य रूप से प्रवाहमयी और ओजस्वी अनुष्टुप छंद का प्रयोग किया गया है, जो लयबद्ध एवं ध्यानात्मक पाठ को सहज बनाता है। इसके प्रारंभिक श्लोक—स्थिरः स्थाणुः प्रभुर्भानुः से लेकर सहस्राक्ष... तक के पद—भाषा की संक्षिप्तता और विशाल दार्शनिक दृष्टि का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करते हैं। प्रत्येक नाम केवल एक विशेषण नहीं है, अपितु एक ऐसा संघनित आध्यात्मिक सूत्र है जो भगवान शिव के निराकार ब्रह्म और साकार जगत दोनों रूपों को एक साथ दर्शाता है। इस साहित्य की संरचना अमूर्त दार्शनिक सिद्धांतों से शुरू होकर भगवान के अलौकिक गुणों के जीवंत चित्रण की ओर सहजता से आगे बढ़ती है।

पारंपरिक अभ्यास में, श्रीशिवसहस्रनाम का पाठ दैनिक और मौसमी अनुष्ठानों में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यद्यपि इसका पाठ वर्ष भर कभी भी किया जा सकता है, तथापि प्रदोष व्रतों, सोमवारों और महाशिवरात्रि जैसे महान निशात्मक पर्वों पर इसकी आध्यात्मिक ऊर्जा कई गुना बढ़ जाती है। साधक सामान्यतः ब्रह्ममुहूर्त के शांत घंटों में या संध्या बेला में स्नान, आचमन तथा शिवलिंग पर जल एवं बिल्वपत्र अर्पित करने के पश्चात इस स्तोत्र का पाठ करते हैं। पूजा की इस व्यवस्थित श्रृंखला में इस दिव्य स्तोत्र को सम्मिलित करने से साधक की आंतरिक चेतना बाहरी कर्मकांडों से ऊपर उठकर गाढ़ ध्यानमग्नता की स्थिति में स्थापित हो जाती है।

प्रामाणिक वेदान्त और शैव दृष्टिकोण से, इन एक हजार नामों के जप का मुख्य आध्यात्मिक लाभ चित्तशुद्धि और मानसिक स्थिरता की प्राप्ति है। पारंपरिक टीकाओं और आचार्यों के वचनों के अनुसार, स्थिरः और स्थाणुः जैसे नामों का ध्यान करने से मन की चंचलता दूर होती है और साधक अचल शांति तथा आंतरिक स्थिरता का अनुभव करता है। आचार्यगण इस बात पर बल देते हैं कि पूर्ण श्रद्धा और बोध के साथ इन दिव्य नामों की पुनरावृत्ति अहंकार का शमन करती है, जिससे भक्त अपनी व्यक्तिगत आत्मा और भगवान शिव द्वारा मूर्त रूप से प्रकट परम चेतना के बीच की अद्वैत एकता को सहज ही पहचान पाता है।

OneSanatan.com के इस डिजिटल प्रस्तुतिकरण के लिए, पाठ की संरचना का मिलान गीता प्रेस और चौखंबा संस्कृत संस्थान जैसे प्रतिष्ठित पारंपरिक प्रकाशनों के प्रामाणिक संस्करणों से सावधानीपूर्वक किया गया है। ये संस्करण वैदिक और पौराणिक ग्रंथों की प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए मुख्य मार्गदर्शक माने जाते हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि पाठकों को शुद्ध संस्कृत पाठ और विश्वसनीय संदर्भ प्राप्त हों। यद्यपि क्षेत्रीय पांडुलिपि परंपराओं में वर्तनी या संधि के कुछ छोटे-छोटे भेद मिल सकते हैं, तथापि इस स्तोत्र का मूल क्रम और इसका आध्यात्मिक महत्व पारंपरिक शास्त्रीय मानकों के अनुसार पूर्णतः सुरक्षित रखा गया है।

अंततः, श्रीशिवसहस्रनाम का यह विशिष्ट अंश आध्यात्मिक मुक्ति और मानसिक संतुलन प्राप्त करने का एक अत्यंत सशक्त मार्ग है। जटी और चर्मी जैसे संन्यासी रूपों से लेकर सर्वभूतहर जैसे रक्षक स्वरूप तक—इन नामों के प्रवाह का ध्यान करने से साधक सांसारिक विकारों से मुक्त होकर भगवत कृपा के शांत आश्रय की ओर अग्रसर होता है। OneSanatan.com पर हम आपको इन पवित्र अक्षरों में अपने हृदय को डुबोने के लिए आमंत्रित करते हैं, ताकि भगवान महाकाल की स्थिर ऊर्जा आपके दैनिक जीवन को आलोकित करे, आपके आंतरिक संघर्षों को समाप्त करे और आपको परम शांति के मार्ग पर अग्रसर करे।

Divine Chanting

Shri Shiva Sahasranama - AI Voice

Sacred AI Recitation
Premium Devotional Experience ॐ

Sacred Script

॥ श्रीशिवसहस्रनामस्तोत्रम् (महाभारत) ॥

स्थिरः स्थाणुः प्रभुर्भानुः प्रवरो वरदो वरः ।
सर्वात्मा सर्वविख्यातः सर्वः सर्वकरो भवः ॥ 1 ॥
जटी चर्मी शिखण्डी च सर्वांगः सर्वभावनः ।
हरिश्च हरिणाक्षश्च सर्वभूतहरः प्रभुः ॥ 2 ॥
प्रवृत्तिश्च निवृत्तिश्च नियतः शाश्वतो ध्रुवः ।
श्मशानचारी भगवान् खचरो गोचरोऽर्दनः ॥ 3 ॥
अभिवाद्यो महाकर्मा तपस्वी भूत भावनः ।
उन्मत्तवेषप्रच्छन्नः सर्वलोकप्रजापतिः ॥ 4 ॥
महारूपो महाकायो वृषरूपो महायशाः ।
महाऽऽत्मा सर्वभूतश्च विरूपो वामनो मनुः ॥ 5 ॥
लोकपालोऽन्तर्हितात्मा प्रसादो हयगर्दभिः ।
पवित्रश्च महांश्चैव नियमो नियमाश्रयः ॥ 6 ॥
सर्वकर्मा स्वयंभूश्चादिरादिकरो निधिः ।
सहस्राक्षो विरूपाक्षः सोमो नक्षत्रसाधकः ॥ 7 ॥
चन्द्रः सूर्यः गतिः केतुर्ग्रहो ग्रहपतिर्वरः ।
अद्रिरद्र्यालयः कर्ता मृगबाणार्पणोऽनघः ॥ 8 ॥
महातपा घोर तपाऽदीनो दीनसाधकः ।
संवत्सरकरो मन्त्रः प्रमाणं परमं तपः ॥ 9 ॥
योगी योज्यो महाबीजो महारेता महातपाः ।
सुवर्णरेताः सर्वज्ञः सुबीजो वृषवाहनः ॥ 10 ॥
दशबाहुस्त्वनिमिषो नीलकण्ठ उमापतिः ।
विश्वरूपः स्वयं श्रेष्ठो बलवीरोऽबलोगणः ॥ 11 ॥
गणकर्ता गणपतिर्दिग्वासाः काम एव च ।
पवित्रं परमं मन्त्रः सर्वभाव करो हरः ॥ 12 ॥
कमण्डलुधरो धन्वी बाणहस्तः कपालवान् ।
अशनी शतघ्नी खड्गी पट्टिशी चायुधी महान् ॥ 13 ॥
स्रुवहस्तः सुरूपश्च तेजस्तेजस्करो निधिः ।
उष्णिषी च सुवक्त्रश्चोदग्रो विनतस्तथा ॥ 14 ॥
दीर्घश्च हरिकेशश्च सुतीर्थः कृष्ण एव च ।
सृगाल रूपः सर्वार्थो मुण्डः कुण्डी कमण्डलुः ॥ 15 ॥
अजश्च मृगरूपश्च गन्धधारी कपर्द्यपि ।
ऊर्ध्वरेतोर्ध्वलिंग ऊर्ध्वशायी नभस्तलः ॥ 16 ॥
त्रिजटैश्चीरवासाश्च रुद्रः सेनापतिर्विभुः ।
अहश्चरोऽथ नक्तं च तिग्ममन्युः सुवर्चसः ॥ 17 ॥
गजहा दैत्यहा लोको लोकधाता गुणाकरः ।
सिंहशार्दूलरूपश्च आर्द्रचर्मांबरावृतः ॥ 18 ॥
कालयोगी महानादः सर्ववासश्चतुष्पथः ।
निशाचरः प्रेतचारी भूतचारी महेश्वरः ॥ 19 ॥
बहुभूतो बहुधनः सर्वाधारोऽमितो गतिः ।
नृत्यप्रियो नित्यनर्तो नर्तकः सर्वलासकः ॥ 20 ॥
घोरो महातपाः पाशो नित्यो गिरि चरो नभः ।
सहस्रहस्तो विजयो व्यवसायो ह्यनिन्दितः ॥ 21 ॥
अमर्षणो मर्षणात्मा यज्ञहा कामनाशनः ।
दक्षयज्ञापहारी च सुसहो मध्यमस्तथा ॥ 22 ॥
तेजोऽपहारी बलहा मुदितोऽर्थोऽजितो वरः ।
गंभीरघोषो गंभीरो गंभीर बलवाहनः ॥ 23 ॥
न्यग्रोधरूपो न्यग्रोधो वृक्षकर्णस्थितिर्विभुः ।
सुदीक्ष्णदशनश्चैव महाकायो महाननः ॥ 24 ॥
विष्वक्सेनो हरिर्यज्ञः संयुगापीडवाहनः ।
तीक्ष्ण तापश्च हर्यश्वः सहायः कर्मकालवित् ॥ 25 ॥
विष्णुप्रसादितो यज्ञः समुद्रो वडवामुखः ।
हुताशनसहायश्च प्रशान्तात्मा हुताशनः ॥ 26 ॥
उग्रतेजा महातेजा जयो विजयकालवित् ।
ज्योतिषामयनं सिद्धिः संधिर्विग्रह एव च ॥ 27 ॥
शिखी दण्डी जटी ज्वाली मूर्तिजो मूर्धगो बली ।
वैणवी पणवी ताली कालः कालकटंकटः ॥ 28 ॥
नक्षत्रविग्रह विधिर्गुणवृद्धिर्लयोऽगमः ।
प्रजापतिर्दिशा बाहुर्विभागः सर्वतोमुखः ॥ 29 ॥
विमोचनः सुरगणो हिरण्यकवचोद्भवः ।
मेढ्रजो बलचारी च महाचारी स्तुतस्तथा ॥ 30 ॥
सर्वतूर्य निनादी च सर्ववाद्यपरिग्रहः ।
व्यालरूपो बिलावासी हेममाली तरंगवित् ॥ 31 ॥
त्रिदशस्त्रिकालधृक् कर्म सर्वबन्धविमोचनः ।
बन्धनस्त्वासुरेन्द्राणां युधि शत्रुविनाशनः ॥ 32 ॥
सांख्यप्रसादो सुर्वासाः सर्वसाधुनिषेवितः ।
प्रस्कन्दनो विभागश्चातुल्यो यज्ञभागवित् ॥ 33 ॥
सर्वावासः सर्वचारी दुर्वासा वासवोऽमरः ।
हेमो हेमकरो यज्ञः सर्वधारी धरोत्तमः ॥ 34 ॥
लोहिताक्षो महाऽक्षश्च विजयाक्षो विशारदः ।
संग्रहो निग्रहः कर्ता सर्पचीरनिवासनः ॥ 35 ॥
मुख्योऽमुख्यश्च देहश्च देह ऋद्धिः सर्वकामदः ।
सर्वकामप्रसादश्च सुबलो बलरूपधृक् ॥ 36 ॥
सर्वकामवरश्चैव सर्वदः सर्वतोमुखः ।
आकाशनिधिरूपश्च निपाती उरगः खगः ॥ 37 ॥
रौद्ररूपोंऽशुरादित्यो वसुरश्मिः सुवर्चसी ।
वसुवेगो महावेगो मनोवेगो निशाचरः ॥ 38 ॥
सर्वावासी श्रियावासी उपदेशकरो हरः ।
मुनिरात्म पतिर्लोके संभोज्यश्च सहस्रदः ॥ 39 ॥
पक्षी च पक्षिरूपी चातिदीप्तो विशांपतिः ।
उन्मादो मदनाकारो अर्थार्थकर रोमशः ॥ 40 ॥
वामदेवश्च वामश्च प्राग्दक्षिणश्च वामनः ।
सिद्धयोगापहारी च सिद्धः सर्वार्थसाधकः ॥ 41 ॥
भिक्षुश्च भिक्षुरूपश्च विषाणी मृदुरव्ययः ।
महासेनो विशाखश्च षष्टिभागो गवांपतिः ॥ 42 ॥
वज्रहस्तश्च विष्कंभी चमूस्तंभनैव च ।
ऋतुरृतु करः कालो मधुर्मधुकरोऽचलः ॥ 43 ॥
वानस्पत्यो वाजसेनो नित्यमाश्रमपूजितः ।
ब्रह्मचारी लोकचारी सर्वचारी सुचारवित् ॥ 44 ॥
ईशान ईश्वरः कालो निशाचारी पिनाकधृक् ।
निमित्तस्थो निमित्तं च नन्दिर्नन्दिकरो हरिः ॥ 45 ॥
नन्दीश्वरश्च नन्दी च नन्दनो नन्दिवर्धनः ।
भगस्याक्षि निहन्ता च कालो ब्रह्मविदांवरः ॥ 46 ॥
चतुर्मुखो महालिंगश्चारुलिंगस्तथैव च ।
लिंगाध्यक्षः सुराध्यक्षो लोकाध्यक्षो युगावहः ॥ 47 ॥
बीजाध्यक्षो बीजकर्ताऽध्यात्मानुगतो बलः ।
इतिहास करः कल्पो गौतमोऽथ जलेश्वरः ॥ 48 ॥
दंभो ह्यदंभो वैदंभो वैश्यो वश्यकरः कविः ।
लोक कर्ता पशु पतिर्महाकर्ता महौषधिः ॥ 49 ॥
अक्षरं परमं ब्रह्म बलवान् शक्र एव च ।
नीतिर्ह्यनीतिः शुद्धात्मा शुद्धो मान्यो मनोगतिः ॥ 50 ॥
बहुप्रसादः स्वपनो दर्पणोऽथ त्वमित्रजित् ।
वेदकारः सूत्रकारो विद्वान् समरमर्दनः ॥ 51 ॥
महामेघनिवासी च महाघोरो वशीकरः ।
अग्निज्वालो महाज्वालो अतिधूम्रो हुतो हविः ॥ 52 ॥
वृषणः शंकरो नित्यो वर्चस्वी धूमकेतनः ।
नीलस्तथाऽंगलुब्धश्च शोभनो निरवग्रहः ॥ 53 ॥
स्वस्तिदः स्वस्तिभावश्च भागी भागकरो लघुः ।
उत्संगश्च महांगश्च महागर्भः परो युवा ॥ 54 ॥
कृष्णवर्णः सुवर्णश्चेन्द्रियः सर्वदेहिनाम् ।
महापादो महाहस्तो महाकायो महायशाः ॥ 55 ॥
महामूर्धा महामात्रो महानेत्रो दिगालयः ।
महादन्तो महाकर्णो महामेढ्रो महाहनुः ॥ 56 ॥
महानासो महाकंबुर्महाग्रीवः श्मशानधृक् ।
महावक्षा महोरस्को अन्तरात्मा मृगालयः ॥ 57 ॥
लंबनो लंबितोष्ठश्च महामायः पयोनिधिः ।
महादन्तो महादंष्ट्रो महाजिह्वो महामुखः ॥ 58 ॥
महानखो महारोमा महाकेशो महाजटः ।
असपत्नः प्रसादश्च प्रत्ययो गिरि साधनः ॥ 59 ॥
स्नेहनोऽस्नेहनश्चैवाजितश्च महामुनिः ।
वृक्षाकारो वृक्ष केतुरनलो वायुवाहनः ॥ 60 ॥
मण्डली मेरुधामा च देवदानवदर्पहा ।
अथर्वशीर्षः सामास्य ऋक्सहस्रामितेक्षणः ॥ 61 ॥
यजुः पाद भुजो गुह्यः प्रकाशो जंगमस्तथा ।
अमोघार्थः प्रसादश्चाभिगम्यः सुदर्शनः ॥ 62 ॥
उपहारप्रियः शर्वः कनकः काञ्चनः स्थिरः ।
नाभिर्नन्दिकरो भाव्यः पुष्करस्थपतिः स्थिरः ॥ 63 ॥
द्वादशस्त्रासनश्चाद्यो यज्ञो यज्ञसमाहितः ।
नक्तं कलिश्च कालश्च मकरः कालपूजितः ॥ 64 ॥
सगणो गण कारश्च भूत भावन सारथिः ।
भस्मशायी भस्मगोप्ता भस्मभूतस्तरुर्गणः ॥ 65 ॥
अगणश्चैव लोपश्च महाऽऽत्मा सर्वपूजितः ।
शंकुस्त्रिशंकुः सम्पन्नः शुचिर्भूतनिषेवितः ॥ 66 ॥
आश्रमस्थः कपोतस्थो विश्वकर्मापतिर्वरः ।
शाखो विशाखस्ताम्रोष्ठो ह्यमुजालः सुनिश्चयः ॥ 67 ॥
कपिलोऽकपिलः शूरायुश्चैव परोऽपरः ।
गन्धर्वो ह्यदितिस्तार्क्ष्यः सुविज्ञेयः सुसारथिः ॥ 68 ॥
परश्वधायुधो देवार्थ कारी सुबान्धवः ।
तुंबवीणी महाकोपोर्ध्वरेता जलेशयः ॥ 69 ॥
उग्रो वंशकरो वंशो वंशनादो ह्यनिन्दितः ।
सर्वांगरूपो मायावी सुहृदो ह्यनिलोऽनलः ॥ 70 ॥
बन्धनो बन्धकर्ता च सुबन्धनविमोचनः ।
सयज्ञारिः सकामारिः महादंष्ट्रो महाऽऽयुधः ॥ 71 ॥
बाहुस्त्वनिन्दितः शर्वः शंकरः शंकरोऽधनः ।
अमरेशो महादेवो विश्वदेवः सुरारिहा ॥ 72 ॥
अहिर्बुध्नो निरृतिश्च चेकितानो हरिस्तथा ।
अजैकपाच्च कापाली त्रिशंकुरजितः शिवः ॥ 73 ॥
धन्वन्तरिर्धूमकेतुः स्कन्दो वैश्रवणस्तथा ।
धाता शक्रश्च विष्णुश्च मित्रस्त्वष्टा ध्रुवो धरः ॥ 74 ॥
प्रभावः सर्वगो वायुरर्यमा सविता रविः ।
उदग्रश्च विधाता च मान्धाता भूत भावनः ॥ 75 ॥
रतितीर्थश्च वाग्मी च सर्वकामगुणावहः ।
पद्मगर्भो महागर्भश्चन्द्रवक्त्रोमनोरमः ॥ 76 ॥
बलवांश्चोपशान्तश्च पुराणः पुण्यचञ्चुरी ।
कुरुकर्ता कालरूपी कुरुभूतो महेश्वरः ॥ 77 ॥
सर्वाशयो दर्भशायी सर्वेषां प्राणिनांपतिः ।
देवदेवः मुखोऽसक्तः सदसत् सर्वरत्नवित् ॥ 78 ॥
कैलास शिखरावासी हिमवद् गिरिसंश्रयः ।
कूलहारी कूलकर्ता बहुविद्यो बहुप्रदः ॥ 79 ॥
वणिजो वर्धनो वृक्षो नकुलश्चन्दनश्छदः ।
सारग्रीवो महाजत्रु रलोलश्च महौषधः ॥ 80 ॥
सिद्धार्थकारी सिद्धार्थश्चन्दो व्याकरणोत्तरः ।
सिंहनादः सिंहदंष्ट्रः सिंहगः सिंहवाहनः ॥ 81 ॥
प्रभावात्मा जगत्कालस्थालो लोकहितस्तरुः ।
सारंगो नवचक्रांगः केतुमाली सभावनः ॥ 82 ॥
भूतालयो भूतपतिरहोरात्रमनिन्दितः ॥ 83 ॥
वाहिता सर्वभूतानां निलयश्च विभुर्भवः ।
अमोघः संयतो ह्यश्वो भोजनः प्राणधारणः ॥ 84 ॥
धृतिमान् मतिमान् दक्षः सत्कृतश्च युगाधिपः ।
गोपालिर्गोपतिर्ग्रामो गोचर्मवसनो हरः ॥ 85 ॥
हिरण्यबाहुश्च तथा गुहापालः प्रवेशिनाम् ।
प्रतिष्ठायी महाहर्षो जितकामो जितेन्द्रियः ॥ 86 ॥
गान्धारश्च सुरालश्च तपः कर्म रतिर्धनुः ।
महागीतो महानृत्तोह्यप्सरोगणसेवितः ॥ 87 ॥
महाकेतुर्धनुर्धातुर्नैक सानुचरश्चलः ।
आवेदनीय आवेशः सर्वगन्धसुखावहः ॥ 88 ॥
तोरणस्तारणो वायुः परिधावति चैकतः ।
संयोगो वर्धनो वृद्धो महावृद्धो गणाधिपः ॥ 89 ॥
नित्यात्मसहायश्च देवासुरपतिः पतिः ।
युक्तश्च युक्तबाहुश्च द्विविधश्च सुपर्वणः ॥ 90 ॥
आषाढश्च सुषाडश्च ध्रुवो हरि हणो हरः ।
वपुरावर्तमानेभ्यो वसुश्रेष्ठो महापथः ॥ 91 ॥
शिरोहारी विमर्शश्च सर्वलक्षण भूषितः ।
अक्षश्च रथ योगी च सर्वयोगी महाबलः ॥ 92 ॥
समाम्नायोऽसमाम्नायस्तीर्थदेवो महारथः ।
निर्जीवो जीवनो मन्त्रः शुभाक्षो बहुकर्कशः ॥ 93 ॥
रत्न प्रभूतो रक्तांगो महाऽर्णवनिपानवित् ।
मूलो विशालो ह्यमृतो व्यक्ताव्यक्तस्तपो निधिः ॥ 94 ॥
आरोहणो निरोहश्च शलहारी महातपाः ।
सेनाकल्पो महाकल्पो युगायुग करो हरिः ॥ 95 ॥
युगरूपो महारूपो पवनो गहनो नगः ।
न्याय निर्वापणः पादः पण्डितो ह्यचलोपमः ॥ 96 ॥
बहुमालो महामालः सुमालो बहुलोचनः ।
विस्तारो लवणः कूपः कुसुमः सफलोदयः ॥ 97 ॥
वृषभो वृषभांकांगो मणि बिल्वो जटाधरः ।
इन्दुर्विसर्वः सुमुखः सुरः सर्वायुधः सहः ॥ 98 ॥
निवेदनः सुधाजातः सुगन्धारो महाधनुः ।
गन्धमाली च भगवान् उत्थानः सर्वकर्मणाम् ॥ 99 ॥
मन्थानो बहुलो बाहुः सकलः सर्वलोचनः ।
तरस्ताली करस्ताली ऊर्ध्व संहननो वहः ॥ 100 ॥
छत्रं सुच्छत्रो विख्यातः सर्वलोकाश्रयो महान् ।
मुण्डो विरूपो विकृतो दण्डि मुण्डो विकुर्वणः ॥ 101 ॥
हर्यक्षः ककुभो वज्री दीप्तजिह्वः सहस्रपात् ।
सहस्रमूर्धा देवेन्द्रः सर्वदेवमयो गुरुः ॥ 102 ॥
सहस्रबाहुः सर्वांगः शरण्यः सर्वलोककृत् ।
पवित्रं त्रिमधुर्मन्त्रः कनिष्ठः कृष्णपिंगलः ॥ 103 ॥
ब्रह्मदण्डविनिर्माता शतघ्नी शतपाशधृक् ।
पद्मगर्भो महागर्भो ब्रह्मगर्भो जलोद्भवः ॥ 104 ॥
गभस्तिर्ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्मविद् ब्राह्मणो गतिः ।
अनन्तरूपो नैकात्मा तिग्मतेजाः स्वयंभुवः ॥ 105 ॥
ऊर्ध्वगात्मा पशुपतिर्वातरंहा मनोजवः ।
चन्दनी पद्ममालाऽग्र्यः सुरभ्युत्तरणो नरः ॥ 106 ॥
कर्णिकार महास्रग्वी नीलमौलिः पिनाकधृक् ।
उमापतिरुमाकान्तो जाह्नवी धृगुमाधवः ॥ 107 ॥
वरो वराहो वरदो वरेशः सुमहास्वनः ।
महाप्रसादो दमनः शत्रुहा श्वेतपिंगलः ॥ 108 ॥
प्रीतात्मा प्रयतात्मा च संयतात्मा प्रधानधृक् ।
सर्वपार्श्व सुतस्तार्क्ष्यो धर्मसाधारणो वरः ॥ 109 ॥
चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा सुवृषो गो वृषेश्वरः ।
साध्यर्षिर्वसुरादित्यो विवस्वान् सविताऽमृतः ॥ 110 ॥
व्यासः सर्वस्य संक्षेपो विस्तरः पर्ययो नयः ।
ऋतुः संवत्सरो मासः पक्षः संख्या समापनः ॥ 111 ॥
कलाकाष्ठा लवोमात्रा मुहूर्तोऽहः क्षपाः क्षणाः ।
विश्वक्षेत्रं प्रजाबीजं लिंगमाद्यस्त्वनिन्दितः ॥ 112 ॥
सदसद् व्यक्तमव्यक्तं पिता माता पितामहः ।
स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम् ॥ 113 ॥
निर्वाणं ह्लादनं चैव ब्रह्मलोकः परागतिः ।
देवासुरविनिर्माता देवासुरपरायणः ॥ 114 ॥
देवासुरगुरुर्देवो देवासुरनमस्कृतः ।
देवासुरमहामात्रो देवासुरगणाश्रयः ॥ 115 ॥
देवासुरगणाध्यक्षो देवासुरगणाग्रणीः ।
देवातिदेवो देवर्षिर्देवासुरवरप्रदः ॥ 116 ॥
देवासुरेश्वरोदेवो देवासुरमहेश्वरः ।
सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो देवताऽऽत्माऽऽत्मसंभवः ॥ 117 ॥
उद्भिदस्त्रिक्रमो वैद्यो विरजो विरजोऽंबरः ।
ईड्यो हस्ती सुरव्याघ्रो देवसिंहो नरर्षभः ॥ 118 ॥
विबुधाग्रवरः श्रेष्ठः सर्वदेवोत्तमोत्तमः ।
प्रयुक्तः शोभनो वर्जैशानः प्रभुरव्ययः ॥ 119 ॥
गुरुः कान्तो निजः सर्गः पवित्रः सर्ववाहनः ।
शृंगी शृंगप्रियो बभ्रू राजराजो निरामयः ॥ 120 ॥
अभिरामः सुरगणो विरामः सर्वसाधनः ।
ललाटाक्षो विश्वदेहो हरिणो ब्रह्मवर्चसः ॥ 121 ॥
स्थावराणांपतिश्चैव नियमेन्द्रियवर्धनः ।
सिद्धार्थः सर्वभूतार्थोऽचिन्त्यः सत्यव्रतः शुचिः ॥ 122 ॥
व्रताधिपः परं ब्रह्म मुक्तानां परमागतिः ।
विमुक्तो मुक्ततेजाश्च श्रीमान् श्रीवर्धनो जगत् ॥ 123 ॥
श्रीमान् श्रीवर्धनो जगत् ॐ नम इति ॥
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Spiritual Guidance

What is the origin of the Shri Shiva Sahasranama and who is the traditional composer?
The Shri Shiva Sahasranama originates from the ancient Hindu epics and Puranas, most notably found in the Anushasana Parva of the Mahabharata. According to scripture, Lord Krishna recites these one thousand sacred names of Lord Shiva to the wise sage Yudhishthira. It was originally imparted to Krishna by the great sage Upamanyu after a period of intense penance and devotion. This lineage ensures its authenticity and profound spiritual potency as a core Vedic hymn.
What is the best time and day of the week to recite the Shiva Sahasranama?
While the Sahasranama can be chanted at any time with a pure heart, the early morning hours during Brahma Muhurta are considered ideal for establishing mental clarity. Mondays, being traditionally dedicated to Lord Shiva, are the most auspicious days to perform this recitation. Additionally, observing these chants during Pradosha times or holy festivals like Maha Shivaratri amplifies the spiritual vibrations and meditative benefits. Consistency in timing helps build a powerful daily spiritual routine.
What specific spiritual benefits does the classical scripture attribute to reciting this hymn?
Classical texts such as the Linga Purana and Mahabharata state that regular recitation of the Shiva Sahasranama grants inner peace, emotional stability, and liberation from fear. It is believed to cleanse the devotee of past karmic burdens and shield them from negative energies. Spiritually, it harmonizes the mind, calms restless thoughts, and nurtures deep devotion, paving the way for self-realization and union with the divine consciousness.
How should a beginner approach learning and chanting the full Sahasranama?
Beginners should not feel overwhelmed by the length of the one thousand names and can start by listening to audio recordings to grasp the correct Sanskrit pronunciation. Reading the provided Hindi and English meanings alongside the lyrics helps connect the mind to the profound significance of each name. It is recommended to start by chanting a smaller section daily, gradually building up stamina and familiarity until the full text can be recited comfortably.
Are there noticeable regional variations in the lyrics of the Shiva Sahasranama?
Yes, slight variations in phrasing and spelling can be found across different geographical regions due to oral transmission traditions and local scriptural recensions, such as the versions from the Mahabharata versus the Rudrakshabala Upanishad. However, the core essence, divine attributes, and foundational names of Lord Shiva remain entirely consistent across all traditions. OneSanatan.com provides standardized lyrics and meanings to help practitioners navigate these variations smoothly.
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शास्त्र-सम्मत • Shastric Verification Drik Ganit Ephemeris Review Classical Text Collation

OneSanatan Vidvat Parishad & Shastra Editorial Council (विद्वत् परिषद्)

Curated and cross-verified by traditional Sanskrit acharyas, Drik Ganit astronomical researchers, and Puranic editors. Every stotra, shloka, and festival calculation is reviewed against canonical classical editions — including Gita Press and Chaukhamba Sanskrit Sansthan — to safeguard textual fidelity, metric rhythm (Chhandas), and spiritual authenticity.