Shri Lalita Sahasranama Full Lyrics with Hindi & English Meaning
Explore the full lyrics of Shri Lalita Sahasranama Full with Hindi and English meaning. Listen to the audio and understand every line for easy devotion and daily chanting.
हिन्दी सारांश
श्री ललिता सहस्रनाम माँ त्रिपुर सुंदरी की एक हजार नामों वाली महिमा है। यह ब्रह्मांडीय चेतना का गान है। माँ ललिता समस्त शक्तियों की स्वामिनी हैं, जो भक्त के हृदय में ज्ञान की अग्नि प्रज्वलित करती हैं और जीवन के हर क्षेत्र में विजय और आनंद प्रदान करती हैं।
English Summary
Shri Lalita Sahasranama is the divine compilation of a thousand names of the Supreme Goddess Tripurasundari. It is a profound meditation on the Primordial Energy (Shakti). Reciting this empowers the soul with supreme wisdom, abundance, and the bliss of cosmic union, overcoming all worldly suffering.
Detailed Spiritual Essence
In हिन्दी & English
Detailed Spiritual Essence
OneSanatan.com के इस पवित्र अंक में आपका स्वागत है, जहाँ हम सनातन धर्म के अत्यंत पूजनीय और दिव्य स्तोत्रों में से एक, श्रीललितासहस्रनाम के आध्यात्मिक मर्म का अन्वेषण कर रहे हैं। इस पावन ग्रंथ की रचना पारंपरिक रूप से वाग्देवताओं—वशिनी, कामेश्वरी और मोदिनी सहित माँ ललिता की आठ अष्ट-शक्तियों—द्वारा होना मानी जाती है, जिन्होंने देवी की कृपा से उनके सहस्र दिव्य नामों का उच्चारण किया था। ऐतिहासिक दृष्टि से यह स्तोत्र ब्रह्मांड पुराण के उत्तरखंड के अंतर्गत हयग्रीव-अगस्त्य संवाद के रूप में संरक्षित है। यह श्रीविद्या और शाक्त परंपरा के अत्यंत गूढ़ व प्रामाणिक ग्रंथों में से एक माना जाता है, जिसका पुरातात्विक और मौखिक संरक्षण प्राचीन तथा मध्यकालीन भारतीय परंपरा का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है।
साहित्यिक और काव्य रूप में, श्रीललितासहस्रनाम अनुष्टुप छंद मेंबद्ध है, जो संस्कृत काव्य का वह सुंदर और प्रवाहित छंद है जो निरंतर पाठ और ध्यान के लिए आदर्श माना जाता है। इसकी मूल भाषा संस्कृत है, जो अपनी दार्शनिक गहराई, अद्भुत ध्वन्यात्मकता और सूक्ष्म पद-रचना के लिए जानी जाती है। इसके सहस्रों नाम केवल संज्ञाएँ नहीं हैं, अपितु स्वतंत्र मंत्र हैं जो अद्वैत वेदांत और तंत्र दर्शन के उच्च सिद्धांतों को सुंदरता से पिरोते हैं। स्तोत्र के आरंभ में दिए गए ध्यान श्लोक—जैसे सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिणयनाम्—साधक को प्रातःकालीन सूर्य के समान अरुण आभा वाली, चंद्रकला से विभूषित, हाथों में इक्षुकण, पुष्पबाण, पाश और अंकुश धारण करने वाली माता भगवती का मानसिक चित्र बनाने में सहायता करते हैं, जिससे मन एकाग्र होकर सहस्रनाम पाठ के लिए तैयार होता है।
पारंपरिक साधना पद्धति में श्रीललितासहस्रनाम का पाठ दैनिक पूजा, नवरात्रि के पावन दिनों, शुक्रवारों और पूर्णिमा की रात्रियों में अत्यंत फलदायी माना जाता है। इसका पाठ सामान्यतः प्रदोष काल या प्रातःकाल के शांत वातावरण में किया जाता है, जो श्रीविद्या उपासना की परंपरा में ललिता त्रिंशती या कवच आदि के साथ एक निश्चित अनुष्ठानिक क्रम का अंग बनता है। साधक लाल पुष्प, कुमकुम और सुगंधित द्रव्यों से अर्चना करते हुए देवी का ध्यान हृदय चक्र में करते हैं। भास्कर आचार्य विरचित 'सौभाग्य भास्कर' जैसे प्रसिद्ध ग्रंथों और आचार्यों के वचनों के अनुसार, इस स्तोत्र का नियमित पाठ अंतःकरण को शुद्ध करता है, चक्रों को संतुलित करता है तथा साधक को जीवन में भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति कराता है।
संपादकीय और ग्रंथ-प्रमाणिकता की दृष्टि से, इस स्तोत्र के मूल पाठ को विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सुरक्षित रखा गया है। गीता प्रेस, गोरखपुर तथा चौखम्बा जैसे पारंपरिक प्रकाशनों और प्रामाणिक संस्कृत संग्रहों द्वारा मुद्रित संस्करणों की सहायता से यह सुनिश्चित किया जाता है कि सहस्रनामों के उच्चारण, संधि और विसर्ग में पूर्ण शुद्धता बनी रहे। OneSanatan.com पर प्रस्तुत यह पावन पाठ उसी पारंपरिक प्रामाणिकता का पालन करता है, ताकि साधकों को हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में इसका सहज, स्पष्ट और मूल भावना के अनुकूल अर्थ प्राप्त हो सके।
आध्यात्मिक दृष्टि से, श्रीललितासहस्रनाम केवल नामों का संग्रह मात्र नहीं है, बल्कि यह चेतना के सर्वोच्च स्तर तक पहुँचने की एक जीवंत यात्रा है। भगवती ललिता त्रिपुरसुंदरी उस अखंड परम सत्य का प्रतीक हैं जो ब्रह्मांड की सृष्टी, पालन और संहार करने वाली शक्ति (शक्ति) के रूप में संपूर्ण जगत में व्याप्त हैं। जैसे-जैसे साधक एक-एक नाम का उच्चारण करता है—जो देवी के गुणों, रूपों और अंतरर्यामी स्वरूप का वर्णन करते हैं—वैसे-वैसे जीव और जगत के बीच का भेद मिटने लगता है। श्रद्धा, भक्ति और सही उच्चारण के साथ किए गए इस सहस्रनाम पाठ से साधक को भगवती महाशक्ति के प्रत्यक्ष अनुभव का अहसास होता है और अंततः उसे यह बोध होता है कि स्तोत्र में वर्णित वह परम चेतना वस्तुतः उसका अपना ही मूल स्वरूप है।
Welcome to OneSanatan.com as we explore the profound spiritual essence of the Shri Lalita Sahasranama, one of the most revered and chanted hymns in Sanatan Dharma. The composition of this sacred text is traditionally attributed to the Vagdevatas—the eight attendant deities of Goddess Lalita, including Vasini, Kamesvari, and Modini—who manifested by her divine grace to utter the thousand names describing her transcendental attributes. Historically preserved within the monumental text of the Brahmanda Purana, specifically in the Uttarokhanda as part of the Hayagriva-Agastya Samvada, this text belongs to the rich esoteric traditions of Srividya and Shaktism. While the Brahmanda Purana as a whole represents an ancient stratum of Puranic literature, the precise date of this specific dialogue is traditionally understood through oral and manuscript preservation to span late classical and early medieval periods.
Literally and poetically, the Shri Lalita Sahasranama is composed in the fluid and melodious Anushtubh metre, a classical Sanskrit poetic verse form ideally suited for continuous recitation and meditative chanting. The original language is classical Sanskrit, characterized by profound metaphysical depth, rich imagery, and precise phonetic architecture. Each of the thousand names is a standalone mantra constructed according to strict grammatical and esoteric principles, utilizing compound words that seamlessly blend aesthetic beauty with non-dualistic philosophical concepts from Advaita Vedanta and Tantra. The hymn opens with vivid visual dhyana shlokas—such as Sinduraruna-vigraham trinayanam—which invite the practitioner to visualize the Goddess radiant as the morning sun, adorned with a crescent moon, holding the sugarcane bow, flower arrows, noose, and goad, thereby establishing an immediate meditative focus before entering the sacred enumeration of her names.
In traditional practice, the recitation of the Shri Lalita Sahasranama occupies a place of supreme importance in daily worship, particularly during sacred periods such as Navaratri, auspicious Fridays, and full moon nights (Purnima). It is ideally chanted during the twilight hours of Pradosha or early morning, forming a vital component of the formal Srividya Upasana sequence after the invocation of secondary stotras like the Lalita Trishati or Kavacham. Practitioners traditionally offer red flowers, kumkum, and fragrant offerings while mentally establishing the presence of the Goddess within the heart chakra. According to venerable acharyas and traditional commentaries such as Bhaskaracharya’s Saubhagya Bhaskara, regular recitation purifies the subtle body, harmonizes the chakras, and awakens inner spiritual clarity, cultivating both material stability and ultimate liberation (bhukti and mukti).
From an editorial and textual verification perspective, authentic versions of this stotra have been carefully preserved across generations. Standardized editions referenced by devoted practitioners and scholars—such as those published by Gita Press, Gorakhpur, and traditional Sanskrit repositories like Chaukhamba—maintain meticulous textual fidelity, ensuring that the sandhi, visarga, and syllabic counts of the thousand names remain undisturbed. Our presentation on OneSanatan.com adheres strictly to these established traditional recensions, ensuring that seekers receive an uncorrupted rendering accompanied by clear contextual meanings in both Hindi and English for deeper contemplation.
At its spiritual core, the Shri Lalita Sahasranama is not merely a catalog of divine epithets but a transformative journey through the architecture of universal consciousness. Goddess Lalita Tripura Sundari represents the supreme, undivided reality—simultaneously transcendent and immanent—who plays as the cosmos through her divine kinetic energy (Shakti). As the seeker moves through names that describe her as the creator, sustainer, and dissolver of universes, as well as the indweller of every soul (Antaryamini), the text dissolves the illusion of separation between the devotee and the divine. Through sincere engagement with these thousand names, orchestrated with devotion and correct pronunciation, the practitioner experiences the living presence of the Divine Mother, ultimately realizing that the supreme consciousness praised in the hymn is identical to one's own innermost Self.
Shri Lalita Sahasranama Full - AI Voice
Sacred Script
ध्यानम् ।
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिणयनां माणिक्यमौलिस्फुर-
त्तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥
अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं धृतपाशाङ्कुशपुष्पबाणचापाम् ।
अणिमादिभिरावृतां मयूखै- -रहमित्येव विभावये भवानीम् ॥
ध्यायेत्पद्मासनस्थां विकसितवदनां पद्मपत्रायताक्षीं
हेमाभां पीतवस्त्रां करकलितलसद्धेमपद्मां वराङ्गीम् ।
सर्वालङ्कारयुक्तां सततमभयदां भक्तनम्रां भवानीं
श्रीविद्यां शान्तमूर्तिं सकलसुरनुतां सर्वसम्पत्प्रदात्रीम् ॥
सकुङ्कुमविलेपनामलिकचुम्बिकस्तूरिकां समन्दहसितेक्षणां सशरचापपाशाङ्कुशाम् ।
अशेषजनमोहिनीमरुणमाल्यभूषाम्बरां जपाकुसुमभासुरां जपविधौ स्मरेदम्बिकाम् ॥
अथ स्तोत्रम् ।
श्रीमाता श्रीमहाराज्ञी श्रीमत्सिंहासनेश्वरी । चिदग्निकुण्डसम्भूता देवकार्यसमुद्यता ॥ १ ॥
उद्यद्भानुसहस्राभा चतुर्बाहुसमन्विता । रागस्वरूपपाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला ॥ २ ॥
मनोरूपेक्षुकोदण्डा पञ्चतन्मात्रसायका । निजारुणप्रभापूरमज्जद्ब्रह्माण्डमण्डला ॥ ३ ॥
चम्पकाशोकपुन्नागसौगन्धिकलसत्कचा । कुरुविन्दमणिश्रेणीकनत्कोटीरमण्डिता ॥ ४ ॥
अष्टमीचन्द्रविभ्राजदलिकस्थलशोभिता । मुखचन्द्रकलङ्काभमृगनाभिविशेषका ॥ ५ ॥
वदनस्मरमाङ्गल्यगृहतोरणचिल्लिका । वक्त्रलक्ष्मीपरीवाहचलन्मीनाभलोचना ॥ ६ ॥
नवचम्पकपुष्पाभनासादण्डविराजिता । ताराकान्तितिरस्कारिनासाभरणभासुरा ॥ ७ ॥
कदम्बमञ्जरीक्लुप्तकर्णपूरमनोहरा । ताटङ्कयुगलीभूततपनोडुपमण्डला ॥ ८ ॥
पद्मरागशिलादर्शपरिभाविकपोलभूः । नवविद्रुमबिम्बश्रीन्यक्कारिरदनच्छदा ॥ ९ ॥
शुद्धविद्याङ्कुराकारद्विजपङ्क्तिद्वयोज्ज्वला । कर्पूरवीटिकामोदसमाकर्षद्दिगन्तरा ॥ १० ॥
निजसल्लापमाधुर्यविनिर्भर्त्सितकच्छपी । मन्दस्मितप्रभापूरमज्जत्कामेशमानसा ॥ ११ ॥
अनाकलितसादृश्यचुबुकश्रीविराजिता । कामेशबद्धमाङ्गल्यसूत्रशोभितकन्धरा ॥ १२ ॥
कनकाङ्गदकेयूरकमनीयभुजान्विता । रत्नग्रैवेयचिन्ताकलोलमुक्ताफलान्विता ॥ १३ ॥
कामेश्वरप्रेमरत्नमणिप्रतिपणस्तनी । नाभ्यालवालरोमालिलताफलकुचद्वयी ॥ १४ ॥
लक्ष्यरोमलताधारतासमुन्नेयमध्यमा । स्तनभारदलन्मध्यपट्टबन्धवलित्रया ॥ १५ ॥
अरुणारुणकौसुम्भवस्त्रभास्वत्कटीतटी । रत्नकिङ्किणिकारम्यरशनादामभूषिता ॥ १६ ॥
कामेशज्ञातसौभाग्यमार्दवोरुद्वयान्विता । माणिक्यमकुटाकारजानुद्वयविराजिता ॥ १७ ॥
इन्द्रगोपपरिक्क्षिप्तस्मरतूणाभजङ्घिका । गूढगुल्फा कूर्मपृष्ठजयिष्णुप्रपदान्विता ॥ १८ ॥
नखदीधितिसञ्छन्ननमज्जनतमोगुणा । पदद्वयप्रभाजालपराकृतसरोरुहा ॥ १९ ॥
शिञ्जानमणिमञ्जीरमण्डितश्रीपदाम्बुजा । मरालीमन्दगमना महालावण्यशेवधिः ॥ २० ॥
सर्वारुणाऽनवद्याङ्गी सर्वाभरणभूषिता । शिवा कामेश्वराङ्कस्था शिवस्वाधीनवल्लभा ॥ २१ ॥
सुमेरुमध्यशृङ्गस्था श्रीमन्नगरनायिका । चिन्तामणिगृहान्तःस्था पञ्चब्रह्मासनस्थिता ॥ २२ ॥
महापद्माटवीसंस्था कदम्बवनवासिनी । सुधासागरमध्यस्था कामाक्षी कामदायिनी ॥ २३ ॥
देवर्षिगणसङ्घातस्तूयमानात्मवैभवा । भण्डासुरवधोद्युक्तशक्तिसेनासमन्विता ॥ २४ ॥
सम्पत्करीसमारूढसिन्धुरव्रजसेविता । अश्वारूढाधिष्ठिताश्वकोटिकोटिभिरावृता ॥ २५ ॥
चक्रराजरथारूढसर्वायुधपरिष्कृता । गेयचक्ररथारूढमन्त्रिणीपरिसेविता ॥ २६ ॥
किरिचक्ररथारूढदण्डनाथापुरस्कृता । ज्वालामालिनिकाक्षिप्तवह्निप्राकारमध्यगा ॥ २७ ॥
भण्डसैन्यवधोद्युक्तशक्तिविक्रमहर्षिता । नित्यापराक्रमाटोपनिरीक्षणसमुत्सुका ॥ २८ ॥
भण्डपुत्रवधोद्युक्तबालाविक्रमनन्दिता । मन्त्रिण्यम्बाविरचितविषङ्गवधतोषिता ॥ २९ ॥
विशुक्रप्राणहरणवाराहीवीर्यनन्दिता । कामेश्वरमुखालोककल्पितश्रीगणेश्वरा ॥ ३० ॥
महागणेशनिर्भिन्नविघ्नयन्त्रप्रहर्षिता । भण्डासुरेन्द्रनिर्मुक्तशस्त्रप्रत्यस्त्रवर्षिणी ॥ ३१ ॥
कराङ्गुलिनखोत्पन्ननारायणदशाकृतिः । महापाशुपतास्त्राग्निनिर्दग्धासुरसैनिका ॥ ३२ ॥
कामेश्वरास्त्रनिर्दग्धसभण्डासुरशून्यका । ब्रह्मोपेन्द्रमहेन्द्रादिदेवसंस्तुतवैभवा ॥ ३३ ॥
हरनेत्राग्निसन्दग्धकामसञ्जीवनौषधिः । श्रीमद्वाग्भवकूटैकस्वरूपमुखपङ्कजा ॥ ३४ ॥
कण्ठाधःकटिपर्यन्तमध्यकूटस्वरूपिणी । शक्तिकूटैकतापन्नकट्यधोभागधारिणी ॥ ३५ ॥
मूलमन्त्रात्मिका मूलकूटत्रयकलेबरा । कुलामृतैकरसिका कुलसङ्केतपालिनी ॥ ३६ ॥
कुलाङ्गना कुलान्तःस्था कौलिनी कुलयोगिनी । अकुला समयान्तःस्था समयाचारतत्परा ॥ ३७ ॥
मूलाधारैकनिलया ब्रह्मग्रन्थिविभेदिनी । मणिपूरान्तरुदिता विष्णुग्रन्थिविभेदिनी ॥ ३८ ॥
आज्ञाचक्रान्तरालस्था रुद्रग्रन्थिविभेदिनी । सहस्राराम्बुजारूढा सुधासाराभिवर्षिणी ॥ ३९ ॥
तटिल्लतासमरुचिः षट्चक्रोपरिसंस्थिता । महासक्तिः कुण्डलिनी बिसतन्तुतनीयसी ॥ ४० ॥
भवानी भावनागम्या भवारण्यकुठारिका । भद्रप्रिया भद्रमूर्तिर्भक्तसौभाग्यदायिनी ॥ ४१ ॥
भक्तिप्रिया भक्तिगम्या भक्तिवश्या भयापहा । शाम्भवी शारदाराध्या शर्वाणी शर्मदायिनी ॥ ४२ ॥
शाङ्करी श्रीकरी साध्वी शरच्चन्द्रनिभानना । शातोदरी शान्तिमती निराधारा निरञ्जना ॥ ४३ ॥
निर्लेपा निर्मला नित्या निराकारा निराकुला । निर्गुणा निष्कला शान्ता निष्कामा निरुपप्लवा ॥ ४४ ॥
नित्यमुक्ता निर्विकारा निष्प्रपञ्चा निराश्रया । नित्यशुद्धा नित्यबुद्धा निरवद्या निरन्तरा ॥ ४५ ॥
निष्ष्कारणा निष्कलङ्का निरुपाधिर्निरीश्वरा । नीरागा रागमथनी निर्मदा मदनाशिनी ॥ ४६ ॥
निश्चिन्ता निरहङ्कारा निर्मोहा मोहनाशिनी । निर्ममा ममताहन्त्री निष्पापा पापनाशिनी ॥ ४७ ॥
निष्क्रोधा क्रोधशमनी निर्लोभा लोभनाशिनी । निःसंशया संशयघ्नी निर्भवा भवनाशिनी ॥ ४८ ॥
निर्विकल्पा निराबाधा निर्भेदा भेदनाशिनी । निर्नाशा मृत्युमथनी निष्क्रिया निष्परिग्रहा ॥ ४९ ॥
निस्तुला नीलचिकुरा निरपाया निरत्यया । दुर्लभा दुर्गमा दुर्गा दुःखहन्त्री सुखप्रदा ॥ ५० ॥
दुष्टदूरा दुराचारशमनी दोषवर्जिता । सर्वज्ञा सान्द्रकरुणा समानाधिकवर्जिता ॥ ५१ ॥
सर्वशक्तिमयी सर्वमङ्गला सद्गतिप्रदा । सर्वेश्वरी सर्वमयी सर्वमन्त्रस्वरूपिणी ॥ ५२ ॥
सर्वयन्त्रात्मिका सर्वतन्त्ररूपा मनोन्मनी । माहेश्वरी महादेवी महालक्ष्मीर्मृडप्रिया ॥ ५३ ॥
महारूपा महापूज्या महापातकनाशिनी । महामाया महासत्त्वा महाशक्तिर्महारतिः ॥ ५४ ॥
महाभोगा महैश्वर्या महावीर्या महाबला । महाबुद्धिर्महासिद्धिर्महायोगेश्वरेश्वरी ॥ ५५ ॥
महातन्त्रा महामन्त्रा महायन्त्रा महासना । महायागक्रमाराध्या महाभैरवपूजिता ॥ ५६ ॥
महेश्वरमहाकल्पमहाताण्डवसाक्षिणी । महाकामेशमहिषी महात्रिपुरसुन्दरी ॥ ५७ ॥
चतुःषष्ट्युपचाराढ्या चतुःषष्टिकलामयी । महाचतुःषष्टिकोटियोगिनीगणसेविता ॥ ५८ ॥
मनुविद्या चन्द्रविद्या चन्द्रमण्डलमध्यगा । चारुरूपा चारुहासा चारुचन्द्रकलाधरा ॥ ५९ ॥
चराचरजगन्नाथा चक्रराजनिकेतना । पार्वती पद्मनयना पद्मरागसमप्रभा ॥ ६० ॥
पञ्चप्रेतासनासीना पञ्चब्रह्मस्वरूपिणी । चिन्मयी परमानन्दा विज्ञानघनरूपिणी ॥ ६१ ॥
ध्यानध्यात्तृध्येयरूपा धर्माधर्मविवर्जिता । विश्वरूपा जागरिणी स्वपन्ती तैजसात्मिका ॥ ६२ ॥
सुप्ता प्राज्ञात्मिका तुर्या सर्वावस्थाविवर्जिता । सृष्टिकर्त्री ब्रह्मरूपा गोप्त्री गोविन्दरूपिणी ॥ ६३ ॥
संहारिणी रुद्ररूपा तिरोधानकरीश्वरी । सदाशिवानुग्रहदा पञ्चकृत्यपरायणा ॥ ६४ ॥
भानुमण्डलमध्यस्था भैरवी भगमालिनी । पद्मासना भगवती पद्मनाभसहोदरी ॥ ६५ ॥
उन्मेषनिमिषोत्पन्नविपन्नभुवनावलिः । सहस्रशीर्षवदना सहस्राक्षी सहस्रपात् ॥ ६६ ॥
आब्रह्मकीटजननी वर्णाश्रमविधायिनी । निजाज्ञारूपनिगमा पुण्यापुण्यफलप्रदा ॥ ६७ ॥
श्रुतिसीमन्तसिन्दूरीकृतपादाब्जधूलिका । सकलागमसन्दोहशुक्तिसम्पुटमौक्तिका ॥ ६८ ॥
पुरुषार्थप्रदा पूर्णा भोगिनी भुवनेश्वरी । अम्बिकाऽनादिनिधना हरिब्रह्मेन्द्रसेविता ॥ ६९ ॥
नारायणी नादरूपा नामरूपविवर्जिता । ह्रीङ्कारी ह्रीमती हृद्या हेयोपादेयवर्जिता ॥ ७० ॥
राजराजार्चिता राज्ञी रम्या राजीवलोचना । रञ्जनी रमणी रस्या रणत्किङ्किणिमेखला ॥ ७१ ॥
रमा राकेन्दुवदना रतिरूपा रतिप्रिया । रक्षाकरी राक्षसघ्नी रामा रमणलम्पटा ॥ ७२ ॥
काम्या कामकलारूपा कदम्बकुसुमप्रिया । कल्याणी जगतीकन्दा करुणारससागरा ॥ ७३ ॥
कलावती कलालापा कान्ता कादम्बरीप्रिया । वरदा वामनयना वारुणीमदविह्वला ॥ ७४ ॥
विश्वाधिका वेदवेद्या विन्ध्याचलनिवासिनी । विधात्री वेदजननी विष्णुमाया विलासिनी ॥ ७५ ॥
क्षेत्रस्वरूपा क्षेत्रेशी क्षेत्रक्षेत्रज्ञपालिनी । क्षयवृद्धिविनिर्मुक्ता क्षेत्रपालसमर्चिता ॥ ७६ ॥
विजया विमला वन्द्या वन्दारुजनवत्सला । वाग्वादिनी वामकेशी वह्निमण्डलवासिनी ॥ ७७ ॥
भक्तिमत्कल्पलतिका पशुपाशविमोचनी । संहृताशेषपाषण्डा सदाचारप्रवर्तिका ॥ ७८ ॥
तापत्रयाग्निसन्तप्तसमाह्लादनचन्द्रिका । तरुणी तापसाराध्या तनुमध्या तमोऽपहा ॥ ७९ ॥
चितिस्तत्पदलक्ष्यार्था चिदेकरसरूपिणी । स्वात्मानन्दलवीभूतब्रह्माद्यानन्दसन्ततिः ॥ ८० ॥
परा प्रत्यक्चितीरूपा पश्यन्ती परदेवता । मध्यमा वैखरीरूपा भक्तमानसहंसिका ॥ ८१ ॥
कामेश्वरप्राणनाडी कृतज्ञा कामपूजिता । शृङ्गाररससम्पूर्णा जया जालन्धरस्थिता ॥ ८२ ॥
ओड्याणपीठनिलया बिन्दुमण्डलवासिनी । रहोयागक्रमाराध्या रहस्तर्पणतर्पिता ॥ ८३ ॥
सद्यःप्रसादिनी विश्वसाक्षिणी साक्षिवर्जिता । षडङ्गदेवतायुक्ता षाड्गुण्यपरिपूरिता ॥ ८४ ॥
नित्यक्लिन्ना निरुपमा निर्वाणसुखदायिनी । नित्याषोडशिकारूपा श्रीकण्ठार्धशरीरिणी ॥ ८५ ॥
प्रभावती प्रभारूपा प्रसिद्धा परमेश्वरी । मूलप्रकृतिरव्यक्ता व्यक्ताव्यक्तस्वरूपिणी ॥ ८६ ॥
व्यापिनी विविधाकारा विद्याऽविद्यास्वरूपिणी । महाकामेशनयनकुमुदाह्लादकौमुदी ॥ ८७ ॥
भक्तहार्दतमोभेदभानुमद्भानुसन्ततिः । शिवदूती शिवाराध्या शिवमूर्तिः शिवङ्करी ॥ ८८ ॥
शिवप्रिया शिवपरा शिष्टेष्टा शिष्टपूजिता । अप्रमेया स्वप्रकाशा मनोवाचामगोचरा ॥ ८९ ॥
चिच्छक्तिश्चेतनारूपा जडशक्तिर्जडात्मिका । गायत्री व्याहृतिः सन्ध्या द्विजबृन्दनिषेविता ॥ ९० ॥
तत्त्वासना तत्त्वमयी पञ्चकोशान्तरस्थिता । निःसीममहिमा नित्ययौवना मदशालिनी ॥ ९१ ॥
मदघूर्णितरक्ताक्षी मदपाटलगण्डभूः । चन्दनद्रवदिग्धाङ्गी चाम्पेयकुसुमप्रिया ॥ ९२ ॥
कुशला कोमलाकारा कुरुकुल्ला कुलेश्वरी । कुलकुण्डालया कौलमार्गतत्परसेविता ॥ ९३ ॥
कुमारगणनाथाम्बा तुष्टिः पुष्टिर्मतिर्धृतिः । शान्तिः स्वस्तिमती कान्तिर्नन्दिनी विघ्ननाशिनी ॥ ९४ ॥
तेजोवती त्रिनयना लोलाक्षीकामरूपिणी । मालिनी हंसिनी माता मलयाचलवासिनी ॥ ९५ ॥
सुमुखी नलिनी सुभ्रूः शोभना सुरनायिका । कालकण्ठी कान्तिमती क्षोभिणी सूक्ष्मरूपिणी ॥ ९६ ॥
वज्रेश्वरी वामदेवी वयोऽवस्थाविवर्जिता । सिद्धेश्वरी सिद्धविद्या सिद्धमाता यशस्विनी ॥ ९७ ॥
विशुद्धिचक्रनिलयाऽऽरक्तवर्णा त्रिलोचना । खट्वाङ्गादिप्रहरणा वदनैकसमन्विता ॥ ९८ ॥
पायसान्नप्रिया त्वक्स्था पशुलोकभयङ्करी । अमृतादिमहाशक्तिसंवृता डाकिनीश्वरी ॥ ९९ ॥
अनाहताब्जनिलया श्यामाभा वदनद्वया । दंष्ट्रोज्ज्वलाऽक्षमालादिधरा रुधिरसंस्थिता ॥ १०० ॥
कालरात्र्यादिशक्त्यौघवृता स्निग्धौदनप्रिया । महावीरेन्द्रवरदा राकिण्यम्बास्वरूपिणी ॥ १०१ ॥
मणिपूराब्जनिलया वदनत्रयसम्युता । वज्रादिकायुधोपेता डामर्यादिभिरावृता ॥ १०२ ॥
रक्तवर्णा मांसनिष्ठा गुडान्नप्रीतमानसा । समस्तभक्तसुखदा लाकिन्यम्बास्वरूपिणी ॥ १०३ ॥
स्वाधिष्ठानाम्बुजगता चतुर्वक्त्रमनोहरा । शूलाद्यायुधसम्पन्ना पीतवर्णाऽतिगर्विता ॥ १०४ ॥
मेदोनिष्ठा मधुप्रीता बन्धिन्यादिसमन्विता । दध्यन्नासक्तहृदया काकिनीरूपधारिणी ॥ १०५ ॥
मूलाधाराम्बुजारूढा पञ्चवक्त्राऽस्थिसंस्थिता । अङ्कुशादिप्रहरणा वरदादिनिषेविता ॥ १०६ ॥
मुद्गौदनासक्तचित्ता साकिन्यम्बास्वरूपिणी । आज्ञाचक्राब्जनिलया शुक्लवर्णा षडानना ॥ १०७ ॥
मज्जासंस्था हंसवतीमुख्यशक्तिसमन्विता । हरिद्रान्नैकरसिका हाकिनीरूपधारिणी ॥ १०८ ॥
सहस्रदलपद्मस्था सर्ववर्णोपशोभिता । सर्वायुधधरा शुक्लसंस्थिता सर्वतोमुखी ॥ १०९ ॥
सर्वौदनप्रीतचित्ता याकिन्यम्बास्वरूपिणी । स्वाहा स्वधाऽमतिर्मेधा श्रुतिः स्मृतिरनुत्तमा ॥ ११० ॥
पुण्यकीर्तिः पुण्यलभ्या पुण्यश्रवणकीर्तना । पुलोमजार्चिता बन्धमोचनी बन्धुरालका ॥ १११ ॥
विमर्शरूपिणी विद्या वियदादिजगत्प्रसूः । सर्वव्याधिप्रशमनी सर्वमृत्युनिवारिणी ॥ ११२ ॥
अग्रगण्याऽचिन्त्यरूपा कलिकल्मषनाशिनी । कात्यायनी कालहन्त्री कमलाक्षनिषेविता ॥ ११३ ॥
ताम्बूलपूरितमुखी दाडिमीकुसुमप्रभा । मृगाक्षी मोहिनी मुख्या मृडानी मित्ररूपिणी ॥ ११४ ॥
नित्यतृप्ता भक्तनिधिर्नियन्त्री निखिलेश्वरी । मैत्र्यादिवासनालभ्या महाप्रलयसाक्षिणी ॥ ११५ ॥
पराशक्तिः परानिष्ठा प्रज्ञानघनरूपिणी । माध्वीपानालसा मत्ता मातृकावर्णरूपिणी ॥ ११६ ॥
महाकैलासनिलया मृणालमृदुदोर्लता । महनीया दयामूर्तिर्महासाम्राज्यशालिनी ॥ ११७ ॥
आत्मविद्या महाविद्या श्रीविद्या कामसेविता । श्रीषोडशाक्षरीविद्या त्रिकूटा कामकोटिका ॥ ११८ ॥
कटाक्षकिङ्करीभूतकमलाकोटिसेविता । शिरःस्थिता चन्द्रनिभा भालस्थेन्द्रधनुःप्रभा ॥ ११९ ॥
हृदयस्था रविप्रख्या त्रिकोणान्तरदीपिका । दाक्षायणी दैत्यहन्त्री दक्षयज्ञविनाशिनी ॥ १२० ॥
दरान्दोलितदीर्घाक्षी दरहासोज्ज्वलन्मुखी । गुरुमूर्तिर्गुणनिधिर्गोमाता गुहजन्मभूः ॥ १२१ ॥
देवेशी दण्डनीतिस्था दहराकाशरूपिणी । प्रतिपन्मुख्यराकान्ततिथिमण्डलपूजिता ॥ १२२ ॥
कलात्मिका कलानाथा काव्यालापविनोदिनी । सचामररमावाणीसव्यदक्षिणसेविता ॥ १२३ ॥
आदिशक्तिरमेयात्मा परमा पावनाकृतिः । अनेककोटिब्रह्माण्डजननी दिव्यविग्रहा ॥ १२४ ॥
क्लीङ्कारी केवला गुह्या कैवल्यपददायिनी । त्रिपुरा त्रिजगद्वन्द्या त्रिमूर्तिस्त्रिदशेश्वरी ॥ १२५ ॥
त्र्यक्षरी दिव्यगन्धाढ्या सिन्दूरतिलकाञ्चिता । उमा शैलेन्द्रतनया गौरी गन्धर्वसेविता ॥ १२६ ॥
विश्वगर्भा स्वर्णगर्भाऽवरदा वागधीश्वरी । ध्यानगम्याऽपरिच्छेद्या ज्ञानदा ज्ञानविग्रहा ॥ १२७ ॥
सर्ववेदान्तसंवेद्या सत्यानन्दस्वरूपिणी । लोपामुद्रार्चिता लीलाक्लुप्तब्रह्माण्डमण्डला ॥ १२८ ॥
अदृश्या दृश्यरहिता विज्ञात्री वेद्यवर्जिता । योगिनी योगदा योग्या योगानन्दा युगन्धरा ॥ १२९ ॥
इच्छाशक्तिज्ञानशक्तिक्रियाशक्तिस्वरूपिणी । सर्वाधारा सुप्रतिष्ठा सदसद्रूपधारिणी ॥ १३० ॥
अष्टमूर्तिरजाजैत्री लोकयात्राविधायिनी । एकाकिनी भूमरूपा निर्द्वैता द्वैतवर्जिता ॥ १३१ ॥
अन्नदा वसुदा वृद्धा ब्रह्मात्मैक्यस्वरूपिणी । बृहती ब्राह्मणी ब्राह्मी ब्रह्मानन्दा बलिप्रिया ॥ १३२ ॥
भाषारूपा बृहत्सेना भावाभावविवर्जिता । सुखाराध्या शुभकरी शोभना सुलभा गतिः ॥ १३३ ॥
राजराजेश्वरी राज्यदायिनी राज्यवल्लभा । राजत्कृपा राजपीठनिवेशितनिजाश्रिता ॥ १३४ ॥
राज्यलक्ष्मीः कोशनाथा चतुरङ्गबलेश्वरी । साम्राज्यदायिनी सत्यसन्धा सागरमेखला ॥ १३५ ॥
दीक्षिता दैत्यशमनी सर्वलोकवशङ्करी । सर्वार्थदात्री सावित्री सच्चिदानन्दरूपिणी ॥ १३६ ॥
देशकालापरिच्छिन्ना सर्वगा सर्वमोहिनी । सरस्वती शास्त्रमयी गुहाम्बा गुह्यरूपिणी ॥ १३७ ॥
सर्वोपाधिविनिर्मुक्ता सदाशिवपतिव्रता । सम्प्रदायेश्वरी साध्वी गुरुमण्डलरूपिणी ॥ १३८ ॥
कुलोत्तीर्णा भगाराध्या माया मधुमती मही । गणाम्बा गुह्यकाराध्या कोमलाङ्गी गुरुप्रिया ॥ १३९ ॥
स्वतन्त्रा सर्वतन्त्रेशी दक्षिणामूर्तिरूपिणी । सनकादिसमाराध्या शिवज्ञानप्रदायिनी ॥ १४० ॥
चित्कलाऽऽनन्दकलिका प्रेमरूपा प्रियङ्करी । नामपारायणप्रीता नन्दिविद्या नटेश्वरी ॥ १४१ ॥
मिथ्याजगदधिष्ठाना मुक्तिदा मुक्तिरूपिणी । लास्यप्रिया लयकरी लज्जा रम्भादिवन्दिता ॥ १४२ ॥
भवदावसुधावृष्टिः पापारण्यदवानला । दौर्भाग्यतूलवातूला जराध्वान्तरविप्रभा ॥ १४३ ॥
भाग्याब्धिचन्द्रिका भक्तचित्तकेकिघनाघना । रोगपर्वतदम्भोलिर्मृत्युदारुकुठारिका ॥ १४४ ॥
महेश्वरी महाकाली महाग्रासा महाशना । अपर्णा चण्डिका चण्डमुण्डासुरनिषूदिनी ॥ १४५ ॥
क्षराक्षरात्मिका सर्वलोकेशी विश्वधारिणी । त्रिवर्गदात्री सुभगा त्र्यम्बका त्रिगुणात्मिका ॥ १४६ ॥
स्वर्गापवर्गदा शुद्धा जपापुष्पनिभाकृतिः । ओजोवती द्युतिधरा यज्ञरूपा प्रियव्रता ॥ १४७ ॥
दुराराध्या दुराधर्षा पाटलीकुसुमप्रिया । महती मेरुनिलया मन्दारकुसुमप्रिया ॥ १४८ ॥
वीराराध्या विराड्रूपा विरजा विश्वतोमुखी । प्रत्यग्रूपा पराकाशा प्राणदा प्राणरूपिणी ॥ १४९ ॥
मार्ताण्डभैरवाराध्या मन्त्रिणीन्यस्तराज्यधूः । त्रिपुरेशी जयत्सेना निस्त्रैगुण्या परापरा ॥ १५० ॥
सत्यज्ञानानन्दरूपा सामरस्यपरायणा । कपर्दिनी कलामाला कामधुक्कामरूपिणी ॥ १५१ ॥
कलानिधिः काव्यकला रसज्ञा रसशेवधिः । पुष्टा पुरातना पूज्या पुष्करा पुष्करेक्षणा ॥ १५२ ॥
परञ्ज्योतिः परन्धाम परमाणुः परात्परा । पाशहस्ता पाशहन्त्री परमन्त्रविभेदिनी ॥ १५३ ॥
मूर्ताऽमूर्ताऽनित्यतृप्ता मुनिमानसहंसिका । सत्यव्रता सत्यरूपा सर्वान्तर्यामिणी सती ॥ १५४ ॥
ब्रह्माणी ब्रह्मजननी बहुरूपा बुधार्चिता । प्रसवित्री प्रचण्डाऽऽज्ञा प्रतिष्ठा प्रकटाकृतिः ॥ १५५ ॥
प्राणेश्वरी प्राणदात्री पञ्चाशत्पीठरूपिणी । विशृङ्खला विविक्तस्था वीरमाता वियत्प्रसूः ॥ १-५६ ॥
मुकुन्दा मुक्तिनिलया मूलविग्रहरूपिणी । भावज्ञा भवरोगघ्नी भवचक्रप्रवर्तिनी ॥ १५७ ॥
छन्दःसारा शास्त्रसारा मन्त्रसारा तलोदरी । उदारकीर्तिरुद्दामवैभवा वर्णरूपिणी ॥ १५८ ॥
जन्ममृत्युजरातप्तजनविश्रान्तिदायिनी । सर्वोपनिषदुद्घुष्टा शान्त्यतीतकलात्मिका ॥ १५९ ॥
गम्भीरा Gagannantasthā गर्विता गानलोलुपा । कल्पनारहिता काष्ठाऽकान्ता कान्तार्धविग्रहा ॥ १६० ॥
कार्यकारणनिर्मुक्ता कामकेलितरङ्गिता । कनत्कनकताटङ्का लीलाविग्रहधारिणी ॥ १६१ ॥
अजा क्षयविनिर्मुक्ता मुग्धा क्षिप्रप्रसादिनी । अन्तर्मुखसमाराध्या बहिर्मुखसुदुर्लभा ॥ १६२ ॥
त्रयी त्रिवर्गनिलया त्रिस्था त्रिपुरमालिनी । निरामया निरालम्बा स्वात्मारामा सुधासृतिः ॥ १६३ ॥
संसारपङ्कनिर्मग्नसमुद्धरणपण्डिता । यज्ञप्रिया यज्ञकर्त्री यजमानस्वरूपिणी ॥ १६४ ॥
धर्माधारा धनाध्यक्षा धनधान्यविवर्धिनी । विप्रप्रिया विप्ररूपा विश्वभ्रमणकारिणी ॥ १६५ ॥
विश्वग्रासा विद्रुमाभा वैष्णवी विष्णुरूपिणी । अयोनिर्योनिनिलया कूटस्था कुलरूपिणी ॥ १६६ ॥
वीरगोष्ठीप्रिया वीरा नैष्कर्म्या नादरूपिणी । विज्ञानकलना कल्या विदग्धा बैन्दवासना ॥ १६७ ॥
तत्त्वाधिका तत्त्वमयी तत्त्वमर्थस्वरूपिणी । सामगानप्रिया सौम्या सदाशिवकुटुम्बिनी ॥ १६८ ॥
सव्यापसव्यमार्गस्था सर्वापद्विनिवारिणी । स्वस्था स्वभावमधुरा धीरा धीरसमर्चिता ॥ १६९ ॥
चैतन्यार्घ्यसमाराध्या चैतन्यकुसुमप्रिया । सदोदिता सदातुष्टा तरुणादित्यपाटला ॥ १७० ॥
दक्षिणादक्षिणाराध्या दरस्मेरमुखाम्बुजा । कौलिनीकेवलाऽनर्घ्यकैवल्यपददायिनी ॥ १७१ ॥
स्तोत्रप्रिया स्तुतिमती श्रुतिसंस्तुतवैभवा । मनस्विनी मानवती महेशी मङ्गलाकृतिः ॥ १७२ ॥
विश्वमाता जगद्धात्री विशालाक्षी विरागिणी । प्रगल्भा परमोदारा परामोदा मनोमयी ॥ १७३ ॥
व्योमकेशी विमानस्था वज्रिणी वामकेश्वरी । पञ्चयज्ञप्रिया पञ्चप्रेतमञ्चाधिशायिनी ॥ १७४ ॥
पञ्चमी पञ्चभूतेशी पञ्चसङ्ख्योपचारिणी । शाश्वती शाश्वतैश्वर्या शर्मदा शम्भुमोहिनी ॥ १७५ ॥
धरा धरसुता धन्या धर्मिणी धर्मवर्धिनी । लोकातीता गुणातीता सर्वातीता शमात्मिका ॥ १७६ ॥
बन्धूककुसुमप्रख्या बाला लीलाविनोदिनी । सुमङ्गली सुखकरी सुवेषाढ्या सुवासिनी ॥ १७७ ॥
सुवासिन्यर्चनप्रीताऽऽशोभना शुद्धमानसा । बिन्दुतर्पणसन्तुष्टा पूर्वजा त्रिपुराम्बिका ॥ १७८ ॥
दशमुद्रासमाराध्या त्रिपुराश्रीवशङ्करी । ज्ञानमुद्रा ज्ञानगम्या ज्ञानज्ञेयस्वरूपिणी ॥ १७९ ॥
योनिमुद्रा त्रिखण्डेशी त्रिगुणाऽम्बा त्रिकोणगा । अनघाऽद्भुतचारित्रा वाञ्छितार्थप्रदायिनी ॥ १८० ॥
अभ्यासातिशयज्ञाता षडध्वातीतरूपिणी । अव्याजकरुणामूर्तिरज्ञानध्वान्तदीपिका ॥ १८१ ॥
आबालगोपविदिता सर्वानुल्लङ्घ्यशासना । श्रीचक्रराजनिलया श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरी ॥ १८२ ॥
श्रीशिवा शिवशक्त्यैक्यरूपिणी ललिताम्बिका । एवं श्रीललितादेव्या नाम्नां साहस्रकं जगुः ॥ १८३ ॥
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